प्रदेश में पहली बार झरने, गाड़-गदेरों का हो रहा सर्वे, तैयार होगा जलस्रोतों का डाटाबेस

प्रदेश में पहली बार झरने, गाड़-गदेरों का सर्वे हो रहा है। अब तक करीब 48 हजार झरनों का रिकॉर्ड रखा गया है। एक माह में यह कार्य पूरा करने का लक्ष्य है।उत्तराखंड में पहली बार झरनों और गाड़-गदेरों की व्यवस्थित गणना की जा रही है। इसके जरिए राज्य में मौजूद प्राकृतिक जल स्रोत की वास्तविक संख्या और उनकी वर्तमान स्थिति का पता लगाया जाना है। सर्वेक्षण पूरा होने के बाद पहली बार सरकार के पास प्रदेश के झरनों और गाड़-गदेरों का प्रामाणिक और व्यापक रिकॉर्ड उपलब्ध होगा। अभी तक की गणना में 48 हजार प्राकृतिक जलस्रोतों का डाटाबेस तैयार किया जा चुका है।लघु सिंचाई विभाग के अधिकारियों के अनुसार, झरनों और गाड़-गदेरों की गणना का काम अंतिम चरण में है और अगले एक महीने के भीतर इसे पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। सर्वेक्षण पूरा होने के बाद यह स्पष्ट होगा कि राज्य में कुल कितने प्राकृतिक जल स्रोत मौजूद हैं और उनकी माैजूदा स्थिति क्या है। कई स्थानों पर झरने सूख चुके हैं, वहीं अनेक स्रोत जलस्तर लगातार घट रहा है। ऐसे में यह सर्वेक्षण जल संकट की वास्तविक स्थिति समझने में मदद करेगा।लघु सिंचाई विभाग के मुख्य अभियंता बीके तिवारी ने बताया कि प्राकृतिक जलस्रोतों की गणना केवल उत्तराखंड तक सीमित नहीं है। केंद्र सरकार देशभर में विभिन्न राज्यों की एजेंसियों और विभागों के सहयोग से जल स्रोतों का सर्वेक्षण करा रही है। इसका उद्देश्य एक राष्ट्रीय डाटाबेस तैयार करना है जिससे देश में मौजूद प्राकृतिक जलस्रोतों की संख्या, स्थिति और संरक्षण की जरूरतों का आंकलन किया जा सके। लघु सिंचाई विभाग की ओर से प्रदेश के सभी 13 जिलों में किए जा रहे सर्वेक्षण में अब तक करीब 48 हजार झरनों का रिकॉर्ड तैयार किया जा चुका है। इनमें सबसे ज्यादा करीब 9600 झरने, गाड़-गदेरे व अन्य प्राकृतिक जल स्रोत मौजूद हैं।



